July 19, 2026

उत्खनन के 50 साल, पुरातात्विक धरोहरों का विकास अधूरा …

0

वर्ष 1975 से उत्खनन में मिली बेशकीमती मूर्तियां व सामग्री, आज भी प्राचीन स्थल खंडहर में तब्दील।

दुर्गा प्रजापति

मस्तूरी  छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक प्राचीन नगरी मल्हार में हुए पुरातात्विक उत्खनन को 50 वर्ष पूरे हो गए हैं, परंतु यहां की धरोहरों का विकास नहीं हुआ है। नगर के लेखक और पुरातत्व प्रेमी राजेश पांडे ने बताया कि वर्ष 1975 से 1978 तक ठाकुर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर की टीम ने प्रो. कृष्ण दत्त वाजपेई के निर्देशन में डॉ. कृष्ण कुमार त्रिपाठी, डॉ. विवेकदत्ता झा, डॉ. श्याम कुमार पांडे तथा स्थानीय छेदीलाल पांडे के सहयोग से उत्खनन कार्य किया था। इसका शुभारंभ अमरनाथ साव ने किया था। इस दौरान बेशकीमती मूर्तियां, सिक्के, मोहरें और

प्राचीन सामग्री मिली थी, जिन्हें सागर के संग्रहालय में रखा गया।

उत्खनन कार्य बाद में बंद हो गया, जिससे लोगों में निराशा हुई। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल भुवनेश्वर, ओडिशा से स्थानांतरित होकर रायपुर मंडल हो गया। इसके बावजूद मल्हार में संस्कृति मंत्रालय की तीन प्राचीन धरोहरें— भीम कीचक मंदिर, भगवान पातालेश्वर महादेव मंदिर और प्राचीन किला— उपेक्षित हैं। कृषक ठाकुर सुमेर सिंह ने कहा कि विभाग ने मोती सागर तालाब के पास बड़ी जमीन अधिग्रहित की है, जहां संग्रहालय या विश्राम गृह बन सकता है, पर कुछ नहीं किया गया। अनिल केवट, जो मां डिडिनेश्वरी देवी मंदिर न्यास के अध्यक्ष हैं, ने कहा कि अन्य जगहों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने करोड़ों रुपए खर्च कर सुंदर कार्य किए हैं, पर मल्हार को छोड़ दिया गया है। लक्ष्मणकांत ने बताया कि वर्ष

2010 में नागपुर की टीम ने प्राचीन किला की खुदाई की थी

जहां महल, औजार, स्नानागार और रसोईकक्ष मिले थे, पर आज वह स्थल जानवरों का चरागाह और नशेड़ियों का अड्डा बन गया है। लेखक पांडे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी, संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, महानिदेशक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं अधीक्षक पुरातत्वविद रायपुर को इस विषय में आवेदन किया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *